Sunday, September 22, 2019
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एक शायरा — एक ग़ज़ल

हर एक घड़ी नब्ज़ मिरी डूब रही है
कैसे मैं कहूँ जीने की उम्मीद लगी है

जागी हूँ तिरी याद में आसुं भी बहाये
तब जा के मुहब्बत की ये तस्वीर बनी है

पहले ही भटकती हूँ मैं अंजान नगर में
अब लेके मुझे जिंदगी किस सम्त चली है

हर एक फसाने में नुमायां है मिरा ग़म
हर एक कहानी में कहानी ये छुपी है

क्यूँ मेरी वफाओं को समझ ही नहीं पाया
वो जिस के लिए रोते मिरी उम्र कटी है

सूखे थे कहाँ अश्क अभी दिन के मिरी ” नाज़ ”
देखा तो शबे ग़म मिरे रस्ते में खड़ी है

  (  नाज़ खान  ---- लंदन  )