Sunday, September 22, 2019
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एक शायरा — एक ग़ज़ल

ज़ुलमतें शब को बहर तौर तो ढलना होगा
अब हर इक सीप से मोती को निकलना होगा

सो चुके हैं जो सभी ख्वाब जगाओ लोगो
दिल को ताबीर की ख्वाहिश पे मचलना होगा

अब तो गिर गिर के सभलने का रवादार नहीं
ठोकरों से तुम्हें हर बार सभलना होगा

अपने आसाब को जज़्बात को फौलादी कर
दिल अगर मोम बना उसको पिघलना होगा

इक ज़रा चूक न कर दे कहीं बर्बाद तुझे
वक्त की लैय पे तुझे झूम के चलना होगा

बन जा तु अहले हुनर खुद पे भरोसा कर ले
वरना तुझको भी खिलौनों पे बहलना होगा

जान ले तु जो है मुमताज़ है मंजिल कोई
आरज़ूओं को सरे दस्त कुचलना होगा

          मुमताज़ मालिक 

        ( पेरिस , फ्रांस )