Tuesday, June 18, 2019
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एक शायरा — एक ग़ज़ल

गायत्री मेहता एक आर्किटेक्ट हैं और कागज़ पर दुनिया आबाद करती हैं , स्कूल के दिनों से कविताएं लिखने का शौक़ है मगर अपनी इस प्रतिभा को उन्होंने छुपाया या फिर इस के लिए समय नहीं निकाल पायीं , दोनो सूरतों में साहित्य और हम जैसे पाठकों का बड़ा नुक़सान हुआ है । इधर कुछ वर्षों से इन्होंने साहित्य के लिए समय निकालने की कोशिश की है और कुछ साहित्यिक गोष्ठियों में नज़र भी आई हैं ।गायत्री जी ग़ज़लें भी लिखती हैं और मुझे एक शायरी की महफ़िल में उन्हें सुनने का अवसर भी मिला है । पेश है ” तेवर न्यूज़ ” पर उनकी एक ग़ज़ल जो आप को पसंद आएगी ।

जिस्म से हो के पार आए हम
रूह बिस्तर पे हार आए हम

ले के दिल में गुबार आए हम
देख,परवरदिगार ! आए हम

उन से मिलने की बेक़रारी थी
मिल के भी बेक़रार आए हम

आखरी बार मिल के आए तो
उस को दिल से उतार आए हम

इक भरोसा दिलाने की खातिर
शर्म अपनी उतार आए हम

अब कि फिर लौट के कहाँ जायें
घर से हो के फरार आए हम

           गायत्री मैहता

        ( दिल्ली , भारत )