Sunday, September 22, 2019
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एक शायरा — एक ग़ज़ल

पूनम माटिया दिल्ली की एक मशहूर शायरा हैं , शायरी के साथ आप कहानियाँ भी लिखती हैं और मंच संचालन भी करती हैं । दिल्ली और देश के अन्य प्रदेशों में होने वाले कवि सम्मेलनों व साहित्यिक प्रोग्रामों में सम्मान के साथ बुलाई जाती हैं । आप कई साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़ी हैं और अपनी ओर से योगदान दे रही हैं । पूनम जी हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी़ भाषा में भी लिखती हैं , अब तक ” स्वप्न श्रंगार – 2011 ” अरमान – 2012 ” अभी तो सागर शेष है – 2015 ” सहित इनकी केई किताबें प्रकाशित हो चूकी हैं । आप को “शान ए हिन्दुस्तान ” हिन्दुस्तान गौरव अवार्ड ” भारतीय महिला गौरव अवार्ड ” समता अवार्ड ” जैसे कई अवार्ड मिल चुके हैं । पूनम माटिया जी की एक ग़ज़ल ” तेवर न्यूज़ ” के पाठकों के लिए पेश की जा रही है ।

ज़िन्दगी को आज़माना जानती हूँ
मैं ग़मों में मुस्कुराना जानती हूँ

चुप हूँ हर इक ज़ुल्म पर लेकिन सुनो तुम
हक़ की ख़ातिर जां लड़ाना जानती हूँ

ये मेरा सजदा नहीं अख़लाक़ ही है
यूँ तो मैं भी सर उठाना जानती हूँ

तुम लगाओ आग लेकिन सोच लेना
मैं भी अपना घर बचाना जानती हूँ

सिर्फ़ ग़ज़लों से नहीं, पूनम’ अमल से
मैं अदब को भी निभाना जानती हूँ



2 thoughts on “एक शायरा — एक ग़ज़ल

  1. ये मेरा सजदा नहीं अख़लाक़ ही है।
    यूँ तो मैं भी सर उठाना जानती हूँ।।
    वाह वाह👍
    क्या कहने, बेहद शानदार ग़ज़ल, आसान लफज़ियात के साथ
    *मुबारकबाद*

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