Sunday, September 22, 2019
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एक शायरा — एक ग़ज़ल

डूब जाये मुझ में जो मुझ को वो हस्ती चाहिये
अब मिरे दरया को इक कागज़ की कश्ती चाहिये

पुर सुकूं बाहर हूँ जितनी अंदर उतना शोर है
कौन कहता है मिरी मौजों को मस्ती चाहिये

आज के बाज़ार में हीरे का गाहक कौन है
आज के सुल्तान को हर चीज़ सस्ती चाहिये

थक चुकी हूँ मैं दरो दीवर में रहते हुऐ
अब मुझे घर चाहिये , अब घर गिरस्ती चाहिये

सर्दियों की रात में बिस्तर की हिद्दत के लिए
दो दिलों के बीच में इक आग जलती चाहिये

अब मुझे मर के ज़मी की खाक होना है ‘ सुमन ‘
अब मुझे आपने लिए इक मीठी धरती चाहिये

समीना रहमत

लंदन , इंग्लैंड

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