Monday, July 22, 2019
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एक शायरा —- एक ग़ज़ल

रोज़ देखा है शफक़ से वो पिघलता सोना
रोज़ सोचा है कि तुम मेरे हो मेरे होना

मैं ने कानों में पहन ली है तुम्हारी आवाज़
अब मिरे वास्ते बेकार है चांदी सोना

मेरी ख़ामोशी को चुपके से सजादो आकर
इक ग़ज़ल तुम भी मिरे नाम कभी लिखो ना

रूह में गीत उतर जाते हैं जैसे खुशबू
गुनगुनाती सी कोई शाम मुझे भेजो ना

चांदनी ओस के कतरे में सिमट जाएगी
तीरगी सुबह सवेरे में कहीं खोदो ना

फिर से आंखों में कोई रंग सजाले ‘ नैनां ‘
कब से ख्वाबों को यहां भूल गई थी बोना

फ़रज़ाना खान नैनां
नाटिंघम , इंग्लैंड

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