Wednesday, November 20, 2019
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एक शायरा , एक नज़्म

प्रेमा झा

रास्ते भर मुहब्बत

रास्ते भर झेंपती रही
कोई देख न ले
इश्क़ में तेरे चूर ये मेरा लाल चेहरा
आँखें सब कह देंगी वो सारी कहानी
जो तुमसे मिलने की बेक़रारी में लिखें हैं
सूखते होंठ प्यास से तड़पते कंठ
और ज़ोर ज़ोर से हांफता दिल
तुम को देख कर और भी कमजो़र हो गया
कुछ भी कहने को शब्द ही नहीं बचे
मानो कोई भाषा नहीं जानती हूँ
पहले तुम से पूछूँ क्या
इसलिए कुछ कहा भी नहीं
क्या मेरी मुहब्बत समझोगे ?
काश! मैं एक सुराही होती
और पड़ी रहती एक कोने तुम्हारे कमरे में
तुम्हारे वस्ल के मलाल में
तुम को मुतमइन करती ठंडी अंजुरियों से
तुम समझ गए होगे अब कि
तब कुछ नहीं बोला जा सकता
जब ज़ोर की प्यास लगी हो
फिर तब तुम
मुहब्बत समझ लोगे शायद!