Tuesday, June 18, 2019
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एक शायर — एक ग़ज़ल

ये भी इक इम्तेहान दे दूँ क्या
दिल के बदले मैं जान देदूँ क्या

रोज़ टकरा के वक़्त हारता है
मांगता है, अमान दे दूँ क्या

पुर तजसस्सुस बहुत है ताएरे शोक़
इसे थोड़ी उड़ान दे दूं क्या

ग़म भी कितने ग़रीब हो गए हैं
दिल का ख़ाली मकान दे दूँ क्या

ढल गई शाम, थक गई होगी
धूप को साएबान दे दूँ क्या

कितने तन्हा हैं शफक़तों के दरख्त
कुछ इन्हें मेहमान दे दूँ क्या

‘ ताज ‘ को तख्ते ज़र नसीब तो है
सर भी शायाने शान दे दूँ क्या

ताज रिज़वी

लखनऊ , भारत

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