Saturday, October 19, 2019
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एक शायर — एक ग़ज़ल

तहसीन मुनव्वर

किस क़दर ऊँचे मेरे दाम हुआ करते थे
कृष्ण मेरे थे मेरे राम हुआ करते थे

मेरे भारत में फक़ीरों की सदा चलती थी
सूफ़ी संतों से यहां काम हुआ करते थे

कल तलक प्यार ही मज़हब था मेरे पुरखों का
कितनी आसानी से हम राम हुआ करते थे

अब जो मलबा यहां नफ़रत का नज़र आता है
प्यार के इस में दर-ओ- बाम हुआ करते थे

हम तो हिंदू भी थे, मुस्लिम भी थे, इंसान भी थे
सुबह जो होते वही शाम हुआ करते थे

इश्क़ आया तो हमें प्यार भरे नाम मिले
प्यार से पहले तो बेनाम हुआ करते थे

अब तो फूलों से गुज़रते हैं बचा कर दामन
जो ” मुनव्वर ” कभी गुलफाम हुआ करते थे

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