Sunday, September 22, 2019
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तारिक़ मतीन की ग़ज़लें ।

समकालीन ग़ज़ल नए ज़माने का भाषायी लिबास पहनकर तमाम सच्चे पाठकों,ग़ज़ल से मुहब्बत करनेवालों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। समय के साथ इसने अपने कनवास में काफी इजाफा किया है। आज इसके गले में किसी एक भाषा और तहजीब का तावीज़ नहीं। मिली-जुली संस्कृति की मिली –जुली भाषा। यही मिली-जुली भाषा हिन्दी को उर्दू के करीब और उर्दू को हिन्दी के करीब लाती है। यह उर्दू में जितनी लोकप्रिय है,हिन्दी में भी इसकी लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। एक विशाल पाठक वर्ग है,जिसके पास सोचने समझने का अमल है। वही पाठक तथाकथित आलोचकों के क्रूर पंजों से इसकी रखवाली भी कर रहा है।

यह बात सच है कि उर्दू के जितने भी बड़े शायर हुए हैं उन्होंने हिन्दी की ओर रुख किया है चाहे वे निदा फाजली,बशीर बद्र, वसीम बरेलवी आदि हों।संग्रह का रूप लेकर हिन्दी जगत में उनकी ग़ज़लें अवश्य आईं और लोकप्रिय हुईं। हिन्दी में ग़ज़ल के स्थापित होने की एक यह भी वजह है।उर्दू के इन ग़ज़लकारों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आज हिन्दी में ग़ज़ल अदब की लहरों में बहने वाले करोड़ों ज़िंदा पाठकों की उपस्थिति दर्ज़ हो चुकी है।ज़िंदा पाठक ही साहित्यिक विधा की धारा का रुख मोड़ते हैं। साहित्य के जीवित रहने की यही सबसे बड़ी शनाख़्त है।
वर्णित उन्हीं बड़े ग़ज़लकारों की कड़ी में उर्दू के बेहतरीन शायर तारिक मतीन की ग़ज़लों का एक संग्रह “उस चेहरे के नाम”हाल ही में हिन्दी लिपि में क्रिएटिव स्टार पब्लिकेशन्स,जामिया नगर,नई दिल्ली से छपकर आया है। संग्रह में कुल 126 ग़ज़लें हैं। तारिक मतीन की एक बड़ी हक़ीक़त ये भी है कि इन्होंने ग़ज़लों में सिर्फ जिया ही नहीं है,परवरिश भी की है, जिस तरह एक माँ ख़ुद से बेफिक्र होकर अपने बच्चे की परवरिश करती है।

जिस तरह तारिक मतीन अपनी साफ़गोई और ग़ज़लिया मिज़ाज के कारण दूर से ही पहचान लिए जाते हैं,उसी तरह इनकी ग़ज़लों के भाव और कथ्य सीधे-सीधे पकड़ में आ जाते हैं। पाठक सोचने के लिए विवश हो जाता है कि कथ्य का रुझान क्या है मसलन जीवन की बावत किस ओर जा रहा है। क्या जीवन की गति तेज़ होती है या उस गति में कोई नए आयाम जोड़े जा सकते हैं।ऐसी ढेर सारी बातें हैं जिन पर कुछ विशेष विवेचना की गुंजाइश बनती है।
संग्रह के चंद शेरों पर गौर फरमाएँ —

ज़िंदगी मैंने दिलो-जान से चाहा तुझको
लेकिन आई न किसी शक्ल में तू रास मुझे
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दिल वो आज़ाद परिंदा है कि जिसको मैंने
क़ैद करना तो बहुत चाहा मगर कर न सका
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फिर से दिल में तेरी यादों का उजाला हुआ है
दर्द जागा है मेरा, ज़ख्म भी ताज़ा हुआ है
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अब इन शेरों में क्रमशः जीवन का व्यापक और भांति-भांति का संदर्भ-संसार खुलता है जिसे शायर पकड़ना और समझना चाहता है। शायर के सामने जीवन के कोमल और कठोर सौंदर्य,रहस्याभासी वायवी प्रेम,कल्पना,स्वप्न की मिली-जुली रूमानी छवि उभरती है,जिन्हें तारिक मतीन जीवन के माध्यम से समझना चाहते हैं।लेकिन इनकी समझ वहाँ तक जाते-जाते असमंजस की स्थिति में आ जाती है। विवेचना की क्षमता रहने के बावजूद जीवन की शुभ्र कल्पना और अभिनंदन तक ही ये सिमट कर रह जाते हैं। यही तो जीवन का शाश्वत सच है। अनेकों प्रयास के बावजूद किसी को यह समझ में नहीं आता कि जीवन क्या है और किस चीज़ की प्रेरणा दे रहा है।
अगर सार में कहें तो तारिक मतीन की ग़ज़लों की शक्ति उनका रागबोध है जो भांति-भांति रूप में देखने को मिल जाता है। सारी ग़ज़लों में अपने हिस्से का संसार,अपने हिस्से का सच और अपने हिस्से का समय है। कहीं स्थिति-वर्णन है तो कहीं जीवन विकास की गति। न कोई वाद और न कहीं कोई प्रतिकार। एक विशेष प्रकार की विवेकात्मक दक्षता है। यही दक्षता ग़ज़ल के उच्च शिखर पर इन्हें बनाए रखती है।

दिल ये कहता है न छोड़ो अभी वीराने को
शाम मजबूर किए जाती है घर जाने को
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हम कड़ी धूप में चल कर नहीं थकते तारिक
एक आँचल की घनी छांव है सुस्ताने को
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गर्द जो दिल पे पड़ी थी सो हटा दी हम ने
लीजिए बीच की दीवार गिरा दी हम ने
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तारिक मतीन ने इस संग्रह के माध्यम ग़ज़ल को एक विधा के रूप में स्थापित करने का सफल प्रयास किया है। अपनी ग़ज़लों को सामाजिक संदर्भों से जोड़ा है। इनके यहाँ अभिव्यक्ति का ढंग अछूता और कहने का अंदाज़ निराला है। हिन्दी जगत स्वागत करेगा,ऐसा विश्वास है।

अनिरुध सिन्हा

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