Monday, July 22, 2019
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बिहार उर्दू एकेडमी को कौन नुक्सान पहुँचा रहा है , उर्दू वाले या बिहार सरकार ?

पिछले एक वर्ष से बिहार उर्दू एकेडमी में सचिव का पद खाली है , जिस से एकेडमी के बहुत से प्रोग्राम नहीं हो पा रहे हैं । किताबों की छपाई के लिये मिलने वाला अनुदान , किताबों पर पुरस्कार , मुशायरे व सेमिनार सहित कई प्रोजेक्ट बंद हैं और ये सब सचिव के न होने से हो रहा है । इस मुद्दे पर सरकार की ख़ामोशी ठीक नहीं है , सरकार को इस ओर क़दम बढ़ाते हुए जल्द से जल्द सचिव नियुक्त करना चाहिए ताकि रुके हुए प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो सके । इसी प्रकार उर्दू वालों को भी आगे बढ़ कर सरकार से बात करनी चाहिए ताकि सही कारण मालूम हो सके । मुमकिन है उर्दू वालों ने बात की भी हो लेकिन कभी कभी ज़्यादा जोगी मठ के उजड़ने का कारण बनता है ।

बिहार उर्दू एकेडमी के संबंध में कुछ उर्दू वालों से मैं ने राय मांगी थी ताकि इस पर कुछ लिखूं  , कई लोगों ने अपनी संवेदनायें लिखी हैं जो पेश की जा रही हैं ।

मशहूर शायर और संपादक इमरान राक़िम लिखते हैं कि अब सभी संस्थाओं में सरकार का हस्ताक्षेप रहता है , सरकार ही एकेडमी को फंड देती है  , इस लिये सरकार ही सचिव भी नियुक्त करती है लेकिन इस में सरकार रजनीतिक पहलुओं से भी देखती और फैसला करती है । एकेडमी में सचिव की नियुक्ति न होने की पुरी ज़िम्मेदारी सरकार पर थोपी नहीं जा सकती , उर्दू वाले भी इस के ज़िम्मेदार हैं ।


शायर व अदीब अशरफ मौलानगरी ने कहा कि उर्दू वाले ही उर्दू के दुश्मन हैं , बिहार में अब कोई एसी तंज़ीम  नहीं रही जो उर्दू की फलाह व बहबूद के लिए तहरीक चला सके । किसी ज़माने में अंजुमन तरक्की उर्द थी । अब वो कमाने खाने का सिर्फ अड्डा बनकर रह गई है । उर्दू की रोटी खाने वाले बेहिस होकर रह गए हैं , कोई तंज़ीम या कोई  शख्स आगे आये और उनकी रहनुमाई में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से वफद की शक्ल में मिलें तो सही । मुझे उमीद ही नहीं बल्कि यकीन है कि बिहार उर्दू अकादमी की कमिटी तशकील पाजायेगी । यहाँ लोग  खुद सेक्रेट्री बनने के चक्र में परे हुए हैं और वो भी उर्दू की खिदमत के लिए नहीं  , अपने फायदे के लिए । 

मशहुर शायर असद रिजवी ने कहा कि बिहार उर्दू एकेडमी पिछले एक वर्ष से बिना सचिव के है , जिस कारण सभी काम रुके हुए हैं । न किताब पर अनु दान मिल रहा है और न किताबों पर पुरस्कार मिल रहा है । सचिव नियुक्त करना सरकार का काम है और उसकी कोई दिलचस्पी ही नहीं है । उर्दू वाले तो मजबूर हैं , वो क्या कर सकते हैं ।


       

बिहार सद्भावना मंच के अध्यक्ष आईन अहमद ने कहा कि ये बहुत ही अफ़सोसनाक है कि ना तो सरकार और ना ही उर्दू वाले इस मामले में रुचि ले रहे हैं । अगर अकादमी में सचिव ही नहीं है तो आप ख़ुद सोचें कि इसका सामान्य काम काज भी कैसे चल रहा होगा
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस पर संज्ञान लेना चाहिए और जल्द से जल्द सचिव पद पर सही व्यक्ति को लाना चाहिए।
अगर ऐसा नहीं होता है तो हम सबको मिलकर इसके लिए आवाज़ उठानी होगी। 

मुंगेर ज़िला कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष मोहम्मद तारिक़ अनवर ने कहा कि नीतीश कुमार बहुत सुनियोजित तरीक़े से प्रदेश में उर्दू भाषा को समाप्त करने के उर्दू बिरोधी एजेंडे पर काम कर रहे हैं । बहुत ही कुटिलता के साथ नीतीश सरकार प्रदेश में उर्दू को समाप्त करने की मुहिम में लगी है और ये काम इतना ख़ुफ़िया तरीक़े से किया जा रहा है कि प्रदेश के ऊर्दू प्रेमी, बुद्धिजीवी, और उर्दू साहित्य से जुड़े लोगों तक को ये समझ मे नहीं आ रहा है। नीतीश की मुस्लिम विरोधी सरकार अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के उन तमाम संगठनों को केवल अपना प्रवक्ता बनाये रखना चाहती है । जहां अल्पसंख्यक कल्याण के लिए योजनाबद्ध तरीक़े से काम किये जाने की आवश्यकता है ।
अल्पसंख्यक आयोग, उर्दू एकेडमी, उर्दू मुशावरती बोर्ड, जैसे संस्थानों के केवल अपने चाटूकारों और पार्टी के कार्यकर्ताओं को अध्यक्ष और सदस्य बना कर उसकी खानापूर्ति कर रही है और वहां उन संस्थानों में किसी भी तरह का अल्पसंख्यक कल्याण जैसा कोई कार्य नहीं हो रहा है । पिछले एक साल से उर्दू एकेडमी में मुकम्मल तौर से सचिव न होने की वजह से सही तरीके से कम नही होरहा है । इस पर कोई भी उर्दू साहित्य से जुड़े लोग सरकार के सामने खड़े होने की ज़ुर्रत भी नही करते है । इस मामले में सरकार तो दोषी है ही लेकिन ये तथाकथित उर्दू की रोटी खाने वाले भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं ।

  ( आप भी इस मुद्दे पर अपना विचार रखना चाहते हैं तो ” [email protected] ” पर भेज दें – संपादक )










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