Friday, May 24, 2019
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भाजपा ने पिछले पांच वर्षों में केवल संप्रदायिकता को बढ़ाया ।

लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है और हर चुनावी योद्धा और रणनीतिकार दिन-रात सभी मोर्चे की किलेबंदी और विरोधी के गढ़ में सेंधमारी करने से ले कर मतदाताओं को रिझाने में जुटा है। सभी राजनितिक दल अपने अपने जीत के दावे कर रहे हैं। लेकिन सम्प्रदायिक राजनीती के लिए कुख्यात भाजपा की चुनावी नैय्या केवल उन्माद और सम्प्रदायिक विभाजन के दरिया पर पार होती है और इसका उसे पुराना अनुभव है बल्कि भाजपा के अस्तित्व में आने के बाद से अभी तक का पूरा चुनावी इतिहास इसी हिन्दू मुस्लिम विभाजन पर खड़ा है। देश में भाजपा सरकार वोट बैंक सुरक्षित करने के लिए ‘‘धार्मिक तनाव उत्पन्न करती आई है और मोदी के उभार के बाद इसमें और तीव्रता आई है। हालाँकि मोदी को बनाने और यहाँ तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले 2002 के गुजरात दंगों के बाद हुए विधानसभा चुनाव को भारत में चनुाव प्रचार का सांप्रदायीकरण करने के रास्ते का एक निर्णायक मील का पत्थर माना जा सकता है।

ऐसा नहीं है के इससे पहले राजनितिक दल और राजेनता चुनाव में धर्म का इस्तमाल नहीं करते थे बल्कि 1952 में हुए पहले आम चुनावों के वक्त से ही भारतीय राजनीति में धर्म की अहम भूमिका रही है लेकिन जहां, इससे पहले नेता लोग मंदिर,मस्जिद, दरगाह या गुरुद्वारे में जाने जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया करते थे वहीं भाजपा ने अब सारी नैतिकता समाप्त कर दी है और कोई लिहाज किए बगैर उसके नेता, सांसद ,मंत्री ,विधायक मुसलमानों ईसाईयों और अन्य शोषितों के ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष रूप से ज़हरीली भाषा, जो कई बार अपमानजक हुआ करती है कि इस्तेमाल पर उतर आए हैं। विगत लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह अच्छे दिनों का वादा कर के सत्ता में आये भाजपाइयों ने पिछले पांच सालों में जनहित से जुड़ा कोई ऐसा बड़ा काम नहीं किया है जो उसकी उपलब्धियों के तौर दिखाया जाए और नेता उस के आधार पर जनता की अदालत में वोट मांग सकें।

पूरे पांच साल घर वापसी,लव जेहाद,गाय गोबर, गौ रक्षा,बीफ़,जेहाद,पाकिस्तान,आईएसआई, सर्जिकल स्ट्राइक, एंटी-रोमियो स्क्वॉड, कसाब,श्मशान-क़ब्रिस्तान, सैफ़ुल्लाह, हैदराबाद का निज़ाम,और सबसे ऊपर वही पुराना राम-मंदिर का राग चलता रहा है लेकिन जनता इन सबसे बहुत अधिक ज़्यादा प्रभावित नहीं हो रही है और ये बात विगत तीन राज्यों के चुनावों में भाजपा को समझ में आ चुकी है। राजस्थान मध्य्प्रदेश और छत्तीसगढ़ में योगी जैसा हार्डकोर हिंदुत्व का चेहरा भी जनता द्वारा बहुत बुरी तरह नकारा गया है। लेकिन भाजपा अपने परम्परागत रवैय्ये को छोड़ना नहीं चाहती है और उसकी मजबूरी भी है के आख़िर नोटबंदी और जीएसटी के नाम पर तो अब वो वोट मांग नहीं सकती। स्टैचू ऑफ़ यूनिटी पर भी अंजाम क्या होना है उसे अच्छी तरह पता है। पुलवामा हमलों के बाद जो थोड़ी बहुत हवा बनी थी वो भी एयर स्ट्राइक की फ़र्ज़ी गिनती के कारण फ़ज़ीहत ही बन गयी है। तो भाजपा ने एक बार फिर अपने चिरपरिचित अंदाज़ में चुनावी शुरुआत की है।

ख़बर आई है के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई ने मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) से मस्जिदों पर विशेष पर्यवेक्षकों को नियुक्त करने का आग्रह किया है। लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं को ‘‘धार्मिक आधारों” पर प्रभावित किए जाने के प्रयास से बचाने के लिए पार्टी ने यह अनुरोध किया है. पार्टी का कहना है कि चुनाव के दौरान मस्जिदों से अल्पसंख्यक समुदाय को प्रभावित किया जा सकता है। सबसे हास्यपद तो ये है कि भाजपा ने आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं पर धार्मिक आधारों पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण का आरोप लगाते हुए सीईओ से मस्जिदों पर विशेष पर्यवेक्षक नियुक्त करने का आग्रह किया है। भाजपा का यह भी कहना है कि प्रदेश की मस्जिदों में अक्सर अल्पसंख्यक वर्ग को प्रभावित करने वाली तकरीरें की जाती हैं और ‘मई के महीने में जब चुनावी प्रक्रिया अंतिम चरण में होगी तो उस वक्त रमजान का पवित्र महीना भी चलेग, उस समय भड़काऊ भाषणों से वर्ग विशेष को प्रभावित किए जाने की प्रबल संभावना है। ऐसे में निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव आयोग को इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए।

ये अपने आप में कितना हास्यपद है के भाजपा दुसरे दलों पर ध्रुवीकरण का आरोप लगा रही है और उसे लगता है रमज़ान में भड़काऊ भाषण दिए जाते हैं। वास्तव में बात ये है कि भाजपा के सातों सांसदों ने अपने अपने क्षेत्र में कोई विकास कार्य शायद ही किया हो और केवल धर्म विशेष के आयोजनों में मंचों पर नज़र आते रहे हैं । लेकिन जनता की अदालत में जाने के लिए कोई उपलब्धि भी तो होनी चाहिए के जब वो आये थे तो क्षेत्र की विकास दर ये थी और अब इस वक़्त यहाँ तक पहुंची है। ऐसा कुछ तो है नहीं तो इसलिए शुरआत मस्जिद के नाम पर की जाये ताकि कुछ दिन बाद उसे फिर मंदिर वहीँ बनाएंगे तक ले जाने में आसानी रहे। भाजपा ने इसी मंशा के साथ मस्जिद में पर्यवेक्षक का मुद्दा उठाया है और हिंदी तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी इसे जिस तरह कवरेज दी है उससे भी बहुत कुछ स्पष्ट होता दिखाई देता है। अभी इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा और उसके नेता अन्य राज्यों में या राष्ट्रिय स्तर पर इस तरह उन्माद भड़का कर या ऐसे ही किसी हवा हवाई मुद्दे को जिसमें धर्म की मिलावट हो द्वारा वोटों को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने का प्रयास नहीं करेंगे। लेकिन फिर भी अब देखना ये है की दिल्ली की जनता मंदिर और मस्जिद में उलझती है या फिर सीवरलाइन। बिजली पानी के नाम पर वोट करने के लिए 12 मई को घर से बाहर निकलती है।

     ( फ़र्रह शकेब )