Sunday, September 22, 2019
HINDI NEWS PORTAL
Home > Vyakti Veshesh > मुशीर साहब ! आप बहुत याद आयेंगे ।

मुशीर साहब ! आप बहुत याद आयेंगे ।

जामिया मिल्लिया इसलामिया में अपने गुज़रे हुए यादों की परतें खुलने लगी । वो इंसान याद आया जिसने बड़ी ख़ामोशी से जामिया के लिए वो सारे काम किए जिसकी वजह से जामिया ने दुनिया में शोर मचा दिया। जामिया के अंदर नयी नयी इमारतें तो बनायी हीं, कई सारे नए कोर्सेज़ लाकर, पुराने कोर्सेज़ में नयी ऊर्जा डाल कर विश्व पटल पर कामयाबी की नयी इबारतें भी लिख डाली। जामिया मिल्लिया इसलामिया से जुड़ा हर शख़्स उस अज़ीम इतिहासकार का ऋणी रहेगा जिसने इस विश्वविद्यालय का नया इतिहास स्थापित किया। वो इतिहासकार अब हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो का ही हो गया। पूर्व उपकुलपति मुशिरुल हसन साहब हमेशा याद आएँगे।

एक बार मैं लाइब्रेरी में बैठा हुआ था। अब का तो पता नहीं पर हमारे ज़माने में लाइब्रेरी में पढ़ाई के साथ साथ बाक़ी सारे काम भी होते थे, जैसे लड़ाईयों की प्लानिंग, बिना पैसों की डेटिंग, करियर प्लानिंग, दिन की नींद, टाँग फैला कर आराम इत्यादि। उस दिन भी एक छात्र टाँग फैला कर आराम फ़रमा रहा था तभी मूशीर साहब लाइब्रेरी आ गए और उस छात्र पर नज़र पड़ी तो उसे टोका । छात्र उनको जानता नहीं था, उसने तुरन्त पूछा कि आप कौन? जवाब मिला ‘माफ़ी चाहूँगा कि आप मुझे नहीं जानते, पर मैं यहाँ का वाइस चैन्सेलर हूँ’। ऐसे थे मूशीर साहब। जल्दी ही लाइब्रेरी के हालात में काफ़ी अच्छे बदलाव लाए गए।

जब जामिया के छात्रों, शिक्षकों और इसकी शान पर विपरीत परिस्थितियाँ आयीं तो मूशीर साहब ने ये साबित किया कि एक असली रहबर कभी भी अपने लोगों को पीठ दिखा कर ग़ायब नहीं होता। वो पीस मार्च, वो ऑडिटॉरीयम में कही गयीं उनकी बातें, समाचार चैनलो पर मज़बूती से दिए गए उनके बयान ना सिर्फ़ जामिया बल्कि पूरी क़ौम के लिए हौसले की वजह बने । उस बुरे दौर में उनका सबसे आगे खड़े हो कर, हर वार का डट कर सामना करना, मैं नहीं भूल सकता।

इनके ज़माने में ही आख़िरी बार छात्र संघ चुनाव संभव हो पाया था। हमलोगो ने उनके सामने बहुत मज़बूती के साथ छात्र संघ की माँग को रखा और आख़िरकार मूशीर साहब ने इजाज़त देदी और कई सालों के बाद छात्र संघ का चुनाव हुआ । सादगी भरी ज़िन्दगी उनकी हम सब के लिए प्रेरणा का श्रोत है । कई बार उनको अकेले विश्वविद्यालय में टहलते घूमते और बच्चों से हाल चाल पूछते देखा गया। डाँटते और टोकते भी थे पर बड़े प्यार से । भारत की आज़ादी के ठीक दो साल बाद जन्मे शानदार इतिहासकार और शिक्षाविद १० दिसंबर को ये दुनिया छोड़ कर चले गए। मूशीर साहब, आप बहुत याद आओगे ।

( आईन अहमद सिद्दीकी )

********************************************