Tuesday, June 18, 2019
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सामाजिक ताना बाना टूटने न दें ।

हम अगर अपनी विचारधारा लोगों तक नहीं पहुंचा पा रहें हैं तो ग़लती लोगों की नहीं, हमारी ही है। सबसे पहले हमें ही सुधरना होगा, और अपने किरदार से अपनी बातें लोगों तक पहुँचानी होगी! जो सामाजिक व्यवस्था आप चाहते हैं पहले उसका मॉडल दिखाना होगा, मॉडल चाहे बहुत ही छोटा क्यूँ ना हो । हमें यह याद रखना होगा कि पूरी दुनिया और पूरी इंसानियत की बेहतरी के लिए काम करने वाले व्यक्ति, समूह या वस्तु को कोई मिटा नहीं सकता! ज़ुल्म को ज़ुल्म से ख़त्म नहीं किया जा सकता! वो घृणा फैला रहे हैं तो आप मुहब्बत फैलाइए, इसमें आप सक्षम हैं, सिर्फ़ भाषण या विलाप से काम नहीं चलेगा!आप दुश्मन से भी दुश्मनी नहीं, मुहब्बत से पेश आइए; एक ना एक दिन वो आपके साथ होंगे!

इसकी शुरुआत हमें ख़ुद से करना होगा ! आईए मिलके बेहतर समाज के लिए एक साथ मेहनत करते हैं! आईए संघर्ष करते हैं व्यक्ति नहीं, उस वैमनस्यता का जो हमारे और आपके (दोनों के) बच्चों के भविष्य को बर्बाद कर देगा! आइए मिलके लड़ते हैं उस बेरोजगारी, अशिक्षा और अत्याचार से जो हम सबको मानव से दानव बनाता जा रहा है! आइए मिलके निर्माण करते हैं उस भारत का जिसमें हमारी अगली पीढ़ी बिना पीड़ा के जीवनयापन कर सके! चुनाव में वोट चाहे आप किसी को भी दिए हों पर अगर आज समाज के लिए एक साथ नहीं आए तो आने वाली पीढ़ी की बर्बादी का सबसे बड़े कारक आप होंगे!

याद रहे धार्मिक कट्टरता और चरमपन्थ में बढ़ोत्री सिर्फ़ सामाजिक और राजनैतिक क्षति ही नहीं पहुँचाता बल्कि आर्थिक संकट की तरफ़ भी ले जाता है। जब तक हम एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते रहेंगे और सामाजिक मुद्दों पे एक-दूसरे का साथ देते रहेंगे, हमारे देश की गंगा-जमनी तहज़ीब को कोई मिटा नहीं सकता। आज देश में बिगरते धार्मिक सदभाव के बीच जब हम एक-दूसरे के साथ मिलते हैं इसका सिर्फ़ यह मतलब नहीं की हम धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं बल्कि एक दूसरे के सांस्कृति समन्वय को और मज़बूत करते हैं।

देश में धार्मिक कट्टरता और चरमपन्थ में बढ़ोत्री सिर्फ़ सामाजिक और राजनीतिक क्षति ही नहीं पहुँचाता बल्कि आर्थिक संकट लाता है। मसलन अगर भारत के लोग डर के मारे देश में सफ़र ही ना कर पाए तो GDP Growth कैसे होगा? और सरकार के ख़ज़ाने में धनराशि कहाँ से आएगी? लोग गाड़ी में पेट्रोल नहीं डलाएँगे, बस और ट्रेन का टिकट नहीं कटाएँगे, मारवारी कपड़ा किसे बेचेंगे, बनियों के व्यापार का क्या होगा, छोटे-छोटे दुकानदारों का क्या होगा, और अंततः देश कहाँ जाएगा? दानव जैसी गतिविधियों से जंगल का निर्माण होगा देश का तो कतई नहीं! देश बनाना है तो पहले मानव संवेदना विकसित करनी होगी! अर्थ से ज़्यादा भाव पर और लक्ष्य से ज़्यादा माध्यम पर ध्यान देना होगा! जैसे कुत्ते को काटने पर आप उसका इलाज़ कराते हैं, उल्टा उसको काटकर आपका दुःख कम नहीं हो सकता! वैसे ही अगर कोई आप पे ज़ुल्म करे तो आप उस ज़ुल्म से संघर्ष कीजिए और ज़रुर कीजिए, व्यक्ति से नहीं! पता कीजिए कि मानव जैसा सामाजिक और संवेदनशील प्राणी आख़िर दानव कैसे होता जा रहा है! कहीं इसमें हमारा भी तो अप्रत्यक्ष योगदान नहीं, क्या हमने अपने महल के पास वाले झोपड़ियों में रहने वाले लोगों को पड़ोसी का हक़ दिया है, अगर अभी तक नहीं तो इसपे ग़ौर कीजियेगा!

देश की समृद्धि के लिए देश में शांति स्तापित होना अत्यावश्यक है; इसके किए धर्मनिरपेक्ष बहुसंख्यको को अल्पसंख्यकों की आवाज़ बननी होगी, उनके मुद्दों को सड़क के संसद तक ले जाना होगा। तमाम शोषितों और बंचितों को उनका अधिकार दिलाना होगा! भारत माता के हर सन्तानों की रक्षा करनी होगी!
यह भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सौहार्द तथा आपसी समन्वय का ही परिणाम है की आज भी दलित और अल्पसंख्यक, संविधान तथा क़ानूनी व्यवस्था में सतत विश्वास बनाए हुए है! जिस दिन देश के बहुसंख्यकों ने अल्पसंख्यकों के अधिकार के लिए संघर्ष करना छोड़ दिया उसी दिन समझिए देश की आत्मा परलोक सिधार चुकी है!

मसला ये नहीं कि हम होली में गए तो वो ईद में आएँ; असल मसला यह कि इसी बहाने हम एक दूसरे के और क़रीब आएँ। धर्म हमार एक व्यक्तिगत मामला है पर ख़ुशी और आपसी भाईचारा सामाजिक मामला। अगर हम बेहतर राष्ट्र की कल्पना करते हैं तो हमें बेहतर समाज का निर्माण करना होगा!आज हमारे और हमसे बड़ों के बीच की दूरी काफ़ी बढ़ गई है तथा हम एक दूसरे की कमी पे ही बात करने में अपनी शक्ति एवं ऊर्जा खर्च कर रहे हैं! एक दूसरे पे ताने और दोषारोपण करना व्यर्थ है, हमें मिलके उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग कर भविष्य के लिए कोई ठोस नीति बनानी चाहिए, जिससे एक परिपूर्ण व्यवस्था सतत चलती रहे! इसमें जिसे जितना हो सके सहयोग करें, कोई धन से, कोई समय से, कोई तन से तथा कोई मन से योगदान दें!

पैसे से ज़्यादा नियत और नीति की समाज को ज़रूर है! विशेष कर युवाओं को चाहिए कि अपने से बड़ो के बीच बैठे और सामाजिक सद्भावना एवं प्रगति के लिए एक दूसरे का पूरक बनें विरोधी नहीं! हमें भी चाहिए कि तर्कपूर्ण आलोचनाओं को सकारात्मक लें और यथासंभव आत्मसात कर आगे बढ़ें! हमें क़दम मिलाके समाज के साथ चलना होगा, बर्बाद होने से पहले सब को संभालना होगा! अपने पुरखों की विरासत मूर्खों से बचाना होगा, नाक़ाम होने से पहले ही काम आना होगा! हमें अपने पूर्वजों के नक़्शे क़दम देशहित और समाजहित में संघर्ष की प्रेरणा लेते रहना होगा! जब अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था में आग लगी हो तो सिर्फ़ अपने बदन पे पानी डालने से कुछ नहीं होगा! हमें विफलताओं से बिना डरे घर से निकलना होगा; विफलता कोई अभिशाप नहीं किसी बड़ी सफलता का प्रवेश द्वार है! जो बरसों खो गया है वो इतनी आसानी से नहीं मिलेगी, आपको सफलता के लिए कार्य करके ही प्रवृति बदलनी और प्रकृति बचानी होगी! सामाजिक सद्भाव तथा प्रगति तभी संभव है, जब समाज अपने निवेश से अपने ही पढ़े लिखे युवाओं को आगे बढ़ाएं, वरना जो जिसके निवेश से नेता बनता है वो उसी का नौकर बनकर रह जाता है! याद रहे तत्काल फ़ायदे के लिए भविष्य का सौदा भयावह होगा!

सबब तलाश करो अपने हार जाने का,
किसी के जीत पे रोने से कुछ नहीं होगा!
अगर है ख़्वाब कि ख्वाहिश तो जागना सीखो,
यू आँख मूँदकर सोने से कुछ नहीं होगा!

   ( शाहनवाज़ भारतीय )