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रोईस मुमताज़ ( क़तर ) की जज़्बाती नज़्म ।

उसे तुम क्या कहोगे जो नये साथी बनाने को पुराने दोस्तों से दामने दिल यूं छुड़ाता है कि जैसे दाग कोई अपने दामन का छुपाता है कि जैसे आँख मिलते ही कोई आँखें चुराता है कि जैसे भूलना चाहे तो कोई भूल जाता है तुम उसको क्या समझते हो कि अच्छा वक़्त

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नाज़ खान (लंदन) की गज़ल ।

वो जो नज़रें झुकाये बैठे हैं मेरे दिल में समाये बैठे हैं कुछ तो नज़रे करम इधर भी हो हम भी महफ़िल में आये बैठे हैं तुझको पाने की अब तमन्ना में गम गले से लगाये बैठे हैं बे

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आज का वोटर और राजनीतिक पार्टियां ।

बानो  आज सुबह भी देर से आई। समीना बड़ बड़ाते  हुए बोली - क्या बात है, आज कल  तुम दो- तीन महीने से जब दिल चाहता है , लेट हो जाती हो। बानो बोली - बाजी , चनाव होने वाले हैं। नेताओं के जलसे  जुलूस होते रहते हैं। बाहर से भी नेता आते- जाते

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एक शायरा — एक ग़ज़ल

गायत्री मेहता एक आर्किटेक्ट हैं और कागज़ पर दुनिया आबाद करती हैं , स्कूल के दिनों से कविताएं लिखने का शौक़ है मगर अपनी इस प्रतिभा को उन्होंने छुपाया या फिर इस के लिए समय नहीं निकाल पायीं , दोनो सूरतों में साहित्य और हम जैसे पाठकों का बड़ा नुक़सान

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संदीप शजर की शायरी ।

संदीप शजर दिल्ली के जाने माने कवि हैं , आप गीत और ग़ज़ल के माध्यम से देश में सद्भाव की गंगा बहाने वाले साहित्यकार हैं । अपनी ग़ज़ल और गीतों में परस्पर प्रेम को परिभाषित कर स्नेह परोसते हैं । युवा राष्ट्र के साहित्य नायक संदीप शजर ने दूरदर्शन,

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एक शायरा — एक ग़ज़ल

ज़ुलमतें शब को बहर तौर तो ढलना होगा अब हर इक सीप से मोती को निकलना होगा सो चुके हैं जो सभी ख्वाब जगाओ लोगो दिल को ताबीर की ख्वाहिश पे मचलना होगा अब तो गिर गिर के सभलने का रवादार नहीं ठोकरों से तुम्हें हर बार सभलना होगा अपने आसाब को जज़्बात

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एक शायर — एक ग़ज़ल

अता आबदी उर्दू शायरी का एक ऐसा परिचित नाम है , जिनकी कई पुस्तकें छप चुकी हैं और जिन्हें आलोचकों व पाठकों ने पसंद किया है । राष्ट्रीय स्तर के कई सम्मान से आप को सम्मानित किया जा चुका है । अता आबदी की एक ग़ज़ल " तेवर न्यूज़ "

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