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एक शायर — एक ग़ज़ल

ख़ालिद महमूद दिल्ली उर्दू एकेडमी के भूतपूर्व वाइस चेयरमैन व उर्दू विभाग, जामिया मिल्लिया इसलामिया , युनिवर्सिटी , दिल्ली के भूतपूर्व विभाग अध्यक्ष प्रो. ख़ालिद महमूद मशहूर शायर व आलोचक हैं । अब तक इनकी 22 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और इनहें कई अवार्ड मिल चुके हैं ।

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एक शायरा — एक नज़्म

मुबीना खा़न लखीमपुर खीरी , उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका हैं और कविताएँ लिखती हैं । उनकी कविताओं की एक मुख़्य ख़ूबी ये है कि उनके शब्द आम बोल चाल के होते हैं और वो बातों बातों में बड़ी बात कह जाती हैं । उनकी एक कविता "

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रोईस मुमताज़ ( क़तर ) की जज़्बाती नज़्म ।

उसे तुम क्या कहोगे जो नये साथी बनाने को पुराने दोस्तों से दामने दिल यूं छुड़ाता है कि जैसे दाग कोई अपने दामन का छुपाता है कि जैसे आँख मिलते ही कोई आँखें चुराता है कि जैसे भूलना चाहे तो कोई भूल जाता है तुम उसको क्या समझते हो कि अच्छा वक़्त

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नाज़ खान (लंदन) की गज़ल ।

वो जो नज़रें झुकाये बैठे हैं मेरे दिल में समाये बैठे हैं कुछ तो नज़रे करम इधर भी हो हम भी महफ़िल में आये बैठे हैं तुझको पाने की अब तमन्ना में गम गले से लगाये बैठे हैं बे

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आज का वोटर और राजनीतिक पार्टियां ।

बानो  आज सुबह भी देर से आई। समीना बड़ बड़ाते  हुए बोली - क्या बात है, आज कल  तुम दो- तीन महीने से जब दिल चाहता है , लेट हो जाती हो। बानो बोली - बाजी , चनाव होने वाले हैं। नेताओं के जलसे  जुलूस होते रहते हैं। बाहर से भी नेता आते- जाते

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एक शायरा — एक ग़ज़ल

गायत्री मेहता एक आर्किटेक्ट हैं और कागज़ पर दुनिया आबाद करती हैं , स्कूल के दिनों से कविताएं लिखने का शौक़ है मगर अपनी इस प्रतिभा को उन्होंने छुपाया या फिर इस के लिए समय नहीं निकाल पायीं , दोनो सूरतों में साहित्य और हम जैसे पाठकों का बड़ा नुक़सान

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