Wednesday, November 20, 2019
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आरएसएस पहले अमन और शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सबूत दे : पॉपुलर फ्रंट

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की कथित पहल से, मुसलमानों के एक समूह के साथ आयोजित बैठक में आरएसएस नेताओं द्वारा किए गए वादों और रखे गए प्रस्तावों को देखते हुए, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के महासचिव एम. मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि आरएसएस उस वक्त तक धार्मिक अल्पसंख्यकों का विश्वास हासिल नहीं कर सकता, जब तक कि वह अपने बुनियादी वैचारिक दस्तावेज़ों को वापस नहीं लेता और अपनी ऐतिहासिक गलतियों के लिए माफी नहीं मांगता। साथ ही उन्होंने कहा कि आरएसएस भारतीय मुसलमानों को सांप्रदायिक सौहार्द्र और अदालत के सम्मान का सबक देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रखता, क्योंकि राष्ट्र हित के खिलाफ जाने का मुसलमानों का कोई इतिहास नहीं है । आरएसएस नेता बार-बार मुसलमानों को बाबरी मस्जिद मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करने और शांति और सौहार्द्र बनाए रखने की नसीहत कर रहे हैं। जहां पॉपुलर फ्रंट इस बात पर मज़बूत यकीन रखता है कि अमन और सांप्रदायिक सौहार्द्र की हर कोशिश चाहे वह कहीं से भी हो, उसका सबको स्वागत करना चाहिए, वहीं ऐसा लगता है कि आरएसएस यह चाहता है कि बाबरी मस्जिद मुकदमे को इस स्थिति तक पहुंचाने में आरएसएस के रोल को लोग भूल जाएं। कोई भी, देश की याद से इस बात को भुला नहीं सकता कि 6 दिसंबर 1992 को संघ परिवार से जुड़े लोगों ने ही बाबरी मस्जिद को दिनदहाड़े गिरा दिया था। सिर्फ मुसलमानों ही नहीं, बल्कि पूरे देश और अवाम के खिलाफ यह सुनियोजित अपराध, अयोध्या के अंदर यथास्थिति बनाए रखने के कोर्ट के आदेश का खुला उल्लंघन करते हुए अंजाम दिया गया।


आरएसएस नेता मुसलमानों के सामने अदालत और विधि नियम का सम्मान करने के बारे में लेक्चर दे रहे हैं, लेकिन उन्हें यह याद होना चाहिए कि इन तमाम सालों में बाबरी मस्जिद के अंदर जबरन और अवैध रूप से मूर्तियां रखे जाने और बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले और बाद से लेकर अब तक मुसलमानों ने हमेशा अदालत पर यकीन रखा है और वे आज भी अपने उसी यकीन और विश्वास पर कायम हैं। अगर आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों के रवैये को अपनाया होता, तो यहां आपसी भरोसे का एक माहौल पैदा होता और सैकड़ों जानें सुरक्षित रहतीं।
आरएसएस के बड़े नेताओं के मुस्लिम समाज के खिलाफ कुछ न बोलने से वे उनका विश्वास नहीं जीत सकते क्योंकि तथ्य और रिकॉर्ड जो कुछ चीख-चीख कर बयान कर रहे हैं, वह इसके बिल्कुल विपरीत है। मुसलमान आरएसएस नेताओं की बातों को गंभीरता से लें, इसके लिए ज़रूरी है आरएसएस अपने अमल से यह साबित करे कि उसके शब्दों में सच्चाई है।
मोहम्मद अली जिन्ना ने इस बात पर बल दिया कि आरएसएस के लिए मुसलमानों और अपने बीच की खाई को कम करने का एकमात्र रास्ता यह है कि आरएसएस अपनी बुनियादी विचारधारा और हिंसक तरीके को हमेशा के लिए छोड़े। अपनी आस्था और मिशन के अनुसार भारतीय मुसलमानों का यह कर्तव्य है कि वे अपने समुदाय से बाहर निकलकर दूसरों के साथ दोस्ताना संबंध और एकजुटता कायम करें। इसलिए मुस्लिम नेताओं के किसी भी तबके की ओर से अन्य समुदायों के साथ मिलकर अमन और शांति की हर कोशिश का स्वागत और समर्थन किया जाना चाहिए।

निसंदेह मौजूदा परिस्थिति में यह एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है और तमाम लोगों के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए। मगर इन कोशिशों के फायदेमंद होने के लिए यह बात काफी महत्व रखती है कि नफरत और हिंसा के सौदागर खुद से अपने आप को सलाहकार न बनाएं । मोहम्मद अली जिन्ना ने आगे कहा कि अगर केंद्र सरकार और अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय सही मायनों में अल्पसंख्यक समुदायों का विश्वास जीतना चाहते हैं तो उन्हें आरएसएस के जनसंपर्क के एजेंडे का रास्ता हमवार करने के बजाय अल्पसंख्यकों के अस्तित्व और विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करने की आवश्यकता है।

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