Sunday, January 26, 2020
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एक शायर — एक ग़ज़ल

जाने किस लम्हा बहक जाये जवानी ही तो है
किस की सूरत पे ये मर जाये दिवानी ही तो है

मोल क्या हो मिरे आंसू का कि ऐ जाने वफ़ा
तेरी नज़रों में हक़ीक़त भी कहानी ही तो है

तुझ से वाबस्ता है जो चीज़ वो प्यारी है बहुत
ज़ख्म दिल तेरी इनायत की निशानी ही तो है

मेरे शेरों में ये तासीर कहाँ से आई
कोई जादू तो नहीं सादा बयानी ही तो है

हम रवायत के तरफ़दार हैं ‘ तारिक़ ‘ साहब
नई ग़ज़लों की रविश आज पुरानी ही तो है

 

तारिक़ मतीन

बेगूसराय , बिहार , भारत

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2 thoughts on “एक शायर — एक ग़ज़ल

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