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एक शायर — एक ग़ज़ल

ज़फ़र अनवर

मंसूर भी अब इश्क़ में रुस्वा नहीं होता
बस्ती में कोई ऐसा तमाशा नहीं होता

है रौशनी दरकार तो दिल अपने जलाओ
मिट्टी के चराग़ों से उजाला नहीं हो ता

दुनियाए मुहब्बत के भी दस्तूर अलग हैं
सर देने से कम पर यहाँ सौदा नहीं होता

वो शोख़ तो बेगाना है अब उस से गिला क्या
अपना भी तो अकसर यहाँ अपना नहीं होता

मुफ़िलस ही को पाया है ‘ ज़फ़र ‘ हम ने तो मुख़िलस
ज़रदार के सर में तो ये सौदा नहीं होता

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