Thursday, February 20, 2020
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राजनीति की आपको समझ नहीं, इसका यह मतलब नहीं कि राजनीति ग़लत है!

शाहनवाज़ भारतीय

जब राजनीति सब तय करने लगी है तो मुसलमानों को भी अपनी राजनीति तय कर लेनी चाहिए। याद रहे, जिस समाज ने सियासत छोड़ी है, इस सियासत ने उस समाज को कहीं का नहीं छोड़ा है। वर्तमान परिदृश्य में, मुसलमानों में एकता तथा नेतृत्व विकसित करने का सबसे अच्छा दिशानिर्देशन राजनीति पढ़ने और गढ़ने की कला ही कर सकता हैहै। इसलिए विषय वस्तु के महत्व को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि आखिर ‘राजनीति’ कहते किसे हैं। हम सब यह जानते है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो मनुष्य समाज में रहना पसंद नहीं करता वह या तो देवता है या दानव | इसी संबंध में अरस्तू ने कहा है कि प्रकृति ने जो दिया है उसमें कोई चीज बेकार नहीं है तथा प्राकृतिक रूप से मनुस्य एक राजनैतिक प्राणी भी हैहै। दूसरी ओर बेर्तोल्त ब्रेख़्त ने कहा है कि सबसे बड़ा अज्ञानी वह है जिसे राजनीति का कोई ज्ञान नहीं है। इसलिए राजनीति की महत्ता को समझते हुए इसके बारे में और अधिक जानना महत्वपूर्ण हो जाता है। पॉलिटिकल ’शब्द का तात्पर्य किसी संगठित समाज या राज्य से संबंधित है। शेल्डन एस वोलिन ने अपनी कृति ‘पॉलिटिक्स एंड विजन 1969 में ‘पॉलिटिकल’ की विशेषताओं के बारे में लिखा है कि एक समाज के सभी आधिकारिक संस्थानों में से, राजनीतिक व्यवस्था को केवल एक व्यक्ति या समूह के साथ ही नहीं पूरे समुदाय के लिए ‘सामान्य’ रूप से देखा जाना चाहिए।

‘पॉलिटी’, ‘पॉलिटिक्स’ और ‘पॉलिटिकल’ शब्द ग्रीक शब्द ‘पॉलिस’ से लिए गए हैं, जो प्राचीन ग्रीक के नगर-राज्य को दर्शाता है। इस रूप में राजनीति एक गतिविधि तथा प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मानव सामाजिक समस्याओं का समाधान बिना किसी हिंसा के करता है। वीले के अनुसार राजनीति सामूहिक पसंद या ना पसंद की असहमति को हल करने के उद्देश्य से वाद-प्रतिवाद, चर्चा-परिचर्चा और समझौता के माध्यम से निर्णय तक पहुंचने की एक प्रक्रिया है। वहीं दूसरी ओर एर्नेस्ट बेन ने राजनीति के संबंध में कहा है कि यह परेशानियों को तलाश करने की कला है। बिस्मार्क ने राजनीति को समस्याओं के समाधान ढूंढने की एक कला के रूप में देखा है। सबाइन ने राजनीति को विरोधी मतों तथा असहमतियों के बीच सहयोगात्मक संवाद स्थापित करने की एक कला के रूप में माना है। मेयो का मानना है कि राजनीति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विवादों का सामुहिक हित में समाधान ढूंढा जाता है। माइकल ओकेशॉट ने राजनीति को एक रोचक परिदृश्य के रूप में पेश किया है! उनके अनुसार, ” राजनीतिक गतिविधि में, मनुष्य एक असीम और अथाह समुद्र में जल यात्रा करता है, जहाँ आश्रय के लिए न तो बंदरगाह है और न ही रुकने के फर्श लंगर, ना ही प्रस्थान बिंदू है और ना ही गंतव्य स्थान; हर हाल में और हर समस्याओं से सामंजस्य बनाते हुए सतत तैरते जाना है | इस संबंध में बरनार्ड क्रिक का मत है कि राजनीति वह गतिविधि है जिसके द्वारा एक राज्य में स्थिरता और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न हितों को एक सरकार के माध्यम से संकलित किया जाता है! वहीं हन्नाह अरेंड ने राजनीति को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा है जिसके माध्यम से विवादों का अहिंसात्मक समाधान किया जाता है, मुद्दों को सुलझाया जाता है और सामुहिक हित में निर्णय किए जाते हैं। इसके अंतर्गत हर समस्या का समाधान वाद-प्रतिवाद और संवाद से होता है, बल तथा हिंसा से नहीं। इसी से मिलता जुलता विचार दुव्रजर का है| उनका मानना है कि किसी भी समस्या का बिना बल पूर्वक समाधान ही राजनीति है | क्रिक यह मानते हैं कि विभिधता से भरे समाज में बिना हिंसा के समाधान की प्रक्रिया राजनैतिक प्रक्रिया है।

साधारण शब्दों में यह कहा जा सकता है कि राजनीति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्तिगत हित से परे होकर सामुहिक हित में बिना किसी हिंसा के निर्णय लिए जाते हों। एक वाक्य में यह कहा जाता सकता है कि राजनीति संपूर्ण समुदाय की सामूहिक शक्ति और जिम्मेदारियों को संदर्भित करती है। अर्थात सामुहिक हित में किसी भी व्यक्ति या समूह के समस्याओं का निवारण संबंधित क्रियाकलाप राजनीति है। शाब्दिक अर्थ और परिभाषा के संदर्भ में राजनीति में कोई त्रुटि नहीं है बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हर व्यक्ति राजनैतिक प्रक्रिया में कहीं ना कहीं भाग लेता है| परंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी राजनीति को ग़लत मानकर अच्छे लोग इससे दूर होते जा रहें हैं परिणामस्वरूप आज भारतीय राजनीति की दशा और दशा अक्षम एवं अयोग्य लोगों पे निर्भर हो गया है।

मैं आश्चर्यचकित हूँ कि अधिकांश स्वघोषित मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने राजनीति को गलत समझ लिया है परिणामस्वरूप महात्मा गांधी के तीन बंदर वाले संदेश को दूसरे रूप में ले लिया है। समाज में हो रही घटनाओं पे कुछ मत बोलों, सुनो, देखो और लिखो। जिस पे अत्याचार हो रहा हो उसी पे दोषारोपण करो और कार्यालय के वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर अत्याचारियों की सिर्फ़ निन्दा करो।कक्षा में बैठकर सच्चाई का ज्ञान दो और सच्चाई के लिए संघर्रत लोगों पे व्यंग करो एवं लज्या को चाय समझ के दिन में दस बार पीयो! जनता के पैसों से देश और दुनिया का भ्रमण करो, प्रेस कॉन्फ़्रेन्स कर उपदेश दो। हमारे पास संसाधन नहीं हैं का बहाना बनाकर अपनी अयोग्यता तथा अक्षमता छुपाते रहो! अक्षम लोगों को आस पास रखो ताकि जय-जयकार होता रहे एवं आपके कृत पर कोई सवाल ना करे और ग़लती से किसी ने सार्थक सवाल किया तो उसको विवादास्पद या इस्लाम विरोधी साबित कर ठिकाना लगा दो| कुछ नहीं करते हुए भी ये मानते रहो कि, सबकुछ ठीक हो जाएगा | कोई भी सामाजिक आंदोलन करने का साहस या क्षमता हो ना हो पर गौरवशाली इतिहास का हवाला देकर अपनी बौद्धिकता का परिचय देते रहो और जो बेचारे पढ़ ना पाए हों उनको दोयम दर्ज़े का मुसलमान समझते रहो।

ख़ास तैर से राजनैतिक शिक्षा के अवनति में मुझे सांगठनिक और संस्थागत दोष लगता है। जिसमें दम नहीं और जो निकम्मा है जुगाड़ से शैक्षणिक तथा धार्मिक संस्थाओं का नेतृत्व उसी के हाथ में चला जाता है और वे लोग दूसरों पे दोषारोपण कर आराम से अपना कार्यकाल पूरा कर, दूसरी बार भी नेताओं का परिक्रमा कर पुनः नेतृत्व में आ जाते हैं। यही चक्र सतत चलता रहता है, परिणामस्वरूप आज के दौर में प्रोफेसर कर्मचारी, तथा अज्ञानी विश्विद्यालय का मालिक हो गया है। पूरे तौर से वैज्ञानिक धर्म भी अवैज्ञानिक नेतृत्व के कारण आज हासिए पर चला गया है, तो समाज में हासिए पे चले गए लोगों में बौद्धिकता का विकास कैसे होगा। आज जब तथाकथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों को भी यह पता नहीं कि ‘शिक्षा’ और ‘वैज्ञानिकता’ क्या है तो वो आम इंसानों को क्या बताएँगे। सरकार ने तो शिक्षा व्यवस्था का नाश करना अपना परम दायित्व समझ ही लिया है ताकि लोगों को कुनेताओं के कुनीतियों का ज्ञान ही ना हो पाए। मेरे समझ से शिक्षा का परम उद्देश्य मनुष्य को तार्किक बनाना है, धनी नहीं | अगर आमजन तक ख़ास शिक्षा पहुंच गई तो लोगों को धर्म और जाति के नाम पर चल रहे खेला का पता चल जाएगा और लोग बदलाव के लिए सवाल करने लगेंगे, सवाल का जवाब नहीं मिलने पर लोग संघर्ष करेंगे और तब राजनीति अपने आप हो जाएगी। असल में, सामुहिक हित के लिए संघर्ष करना ही राजनीति है और ऐसे ही राजनीति से मुसलमानों का कुछ भला हो सकता है। इसी संबंध में पेरिकल्स ने कहा है कि आप राजनीति में रूचि नहीं लेंगे इसका यह मतलब नहीं कि राजनीति आप में रूचि नहीं लेगा | आपके पैदा लेने से लेकर क़ब्र तक, नमक से लेकर कफ़न तक हर चीज़ का निर्धारण राजनीति ही तय करता है तो मुसलमानों को उठ खड़े होकर अभी से अपनी राजनीति तय करनी चाहिए।

जब मोहसिन-ए क़ौम, खादिम-ए-हुक्काम होने लगे तो से उस क़ौम को अपना रहबर अपने समाज में से चुनना चाहिए, समाज से मेरी मुराद यह है कि जब नेता अपने पैसों के बल पे या पार्टियों की चमचागिरी कर बनेंगे तो वो अपने दल के ही होके रहेंगे समाज के नहीं! जिस दिन से समाज के लोग अपना नेता ख़ुद चुनने लगेंगे, उसी दिन से लोगों को फ़ालतू कामों में घूस देने से मुक्ति मिल जाएगी और उसी दिन से पुलिस भी “नेताओं” के चंगुल से आज़ाद हो जाएगीजाएगी। अगर अब लम्हों ने खता की तो सदियों तक सजा पाएंगे। मुसलमानों को चाहिए कि दल या पैसा नहीं, व्यक्ति देखकर साथ आएं तथा वर्तमान में जो भी ईमानदार लोग राजनीति कर रहे हैं उनका साथ दें। आज के युग में ईमानदारी से सियासत करना कठिन है तो अगर कोई अपने समाज से सियासत की दुनिया में ईमानदारी से लड़ रहा हो तो कम से कम हम उनका सम्मान करें, तथा यथासंभव साथ भी दें। क्योंकि जिस समाज ने सियासत छोड़ी है, इस सियासत ने उस समाज को कहीं का नहीं छोड़ा है! किसी भी काम में सफलता की कुंजी सूरह असर में स्पष्ट लिखा है, मुसलमानों ने अगर कुछ चीजों को अपना लिया इनमें एकता भी होगी और नेतृत्व क्षमता भी उभरेगी,

  1. अपने काम में ईमानदारी
  2. सब्र तथा समय का सदुपयोग
    3.अपनों में अच्छाई, और ग़ैरों में बुराई ढूंढना
  3. बुराई करने और साथ देने वालों का विरोध और उसका विरोध करने वालों का साथ!
  4. धार्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं का रचनात्मक आलोचना! कहा जाता है कि जिस दिन मुसलमानों को फितरा, ज़कात और वोट देने आ गया इसे सियासत में गल्वा पाने से कोई नहीं रोक सकता!
  5. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हमें संविधान बचाने की आवश्यकता है, अगर संविधान बच गया तो सारे धर्म तथा सारा समाज एवं देश स्वतः ही बच जाएगा!
    अगर उपर्युक्त छः बिंदुओं पे भी हमने गंभीरता से मंथन कर लिया तो सफलता अवश्यम्भावी है।